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बड़कागांव : कोयला खनन के इस उभरते क्षेत्र के लोग किस तरह की चुनौतियों से जूझ रहे हैं?

जुगरा गांव के ग्रामीण।

राहुल सिंह की रिपोर्ट

हजारीबाग जिले में पड़ने वाला बड़कागांव प्रखंड मुख्यालय एक छोटी-सी जगह है, जो राजधानी रांची से करीब 80 किलोमीटर और अपने जिला मुख्यालय से 25 किमी दूर है। झारखंड जैसे बेहद पुराने कोयला उत्पादक राज्य में बड़कागांव एक उभरता हुआ नया कोयला खनन क्षेत्र है, जहां पिछले डेढ-दो दशक में एक के बाद एक कई कंपनियां माइनिंग के लिए पहुंच रही हैं और अपना निवेश बढा रही हैं। बड़कागांव कोयला खनन क्षेत्र को इस प्रखंड क्षेत्र के दायरे में नहीं, बल्कि उसके आसपास के इलाके से समझा जा सकता है, जैसे झरिया कोयला खनन क्षेत्र का विस्तार झरिया से बाहर के इलाके तक है। फिलहाल बड़कागांव में भारत सरकार की प्रमुख ऊर्जा उत्पादक कंपनी एनटीपीसी सबसे प्रमुख खननकर्ता है, जो एक मध्यस्थ कंपनी से अपने पॉवर प्लांटों के लिए कोयला का खनन करवाती है।

बड़कागांव स्थित एनटीपीसी की कोयला परियोजना।

 

इसके अलावा अदानी, हिंडाल्को सहित कुछ अन्य निजी कंपनियां ने भी हाल के सालों में यहां उपस्थिति दर्ज हुई है। बड़कागांव के करीब स्थित चतरा जिले के टंडवा में एनटीपीसी का एक पॉवर प्लांट निर्माणाधीन है, जिसमें 660-660 मेगावाट यानी कुल 1980 मेगावाट क्षमता की तीन यूनिट लग रही है। यह जगह रामगढ़ जिले के पतरातू से भी करीब है, जहां एनटीपीसी का जेबीवीएनएल के साथ एक संयुक्त उपक्रम के रूप में पॉवर प्लांट निर्माणाधीन है।

टंडवा में निर्माणाधीन एनटीपीसी का पॉवर प्लांट।

 

इतनी अधिक संख्या में कोयला खनन व ऊर्जा उत्पादक परियोजनाएं होने के बावजूद इस क्षेत्र के लोगों की जिंदगी कितनी अधिक बदली है, यह एक अहम सवाल होना चाहिए। ऐसा लग सकता है कि कोयला और ऊर्जा के इस नए उभरते केंद्र व उसके आसपास सबकुछ अच्छा होगा, लोगों की आय बढी होगी, जीवन स्तर ऊंचा हुआ होगा, सुविधाएं बढी होंगी। लेकिन क्या ऐसा है? 

 

बड़कागांव बाजार का दृश्य।

 

अगस्त के तीसरे सप्ताह एक शाम बड़कागांव बाजार अंधेरे में डूबा हुआ था। यहां बाजार में एक चप्पल-जूते की दुकान के संचालक मो शमीम ने कहा, “बिजली नहीं रहना आम बात है और लोग इसके आदि हो गए हैं”। आमतौर पर झारखंड के कोयला क्षेत्रों में शाम में बाजार में रौनक रहती है, लेकिन बड़कागांव इससे अलग है। यहां के एक युवा अमित ने कहा, “घंटों बिजली नहीं रहना सामान्य बात है, जबकि यहां कई बड़ी कंपनियां माइनिंग कर रही हैं और उनकी यूनिटें में रोशनी देख लगता है कि दिवाली हो, जबकि आमलोग अंधेरा झेलने को विवश हैं”। मानव बसावट से उलट कोयला खनन परियोजनाएं अंधेरा ढलते ही बिचली से रौशन रहती हैं। बड़कागांव में औसत 12 घंटे बिजली रहना भी बड़ी बात है। अमित कहते हैं, “हमारे यहां के कोयले से देश के महानगर रौशन होते हैं और हम अंधेरे में रहते हैं”।

एनटीपीसी की कोयला परियोजना का रात में दृश्य।

 

खनन परियोजना के प्रभावितों का क्या कहना है?

बड़कागांव की चेपकला पंचायत के आराहरा गांव के 62 वर्षीय बुजुर्ग तुलसी महतो कहते हैं, “दो साल से पकरी बरवाडीह खदान बंद है, 2016 में यहां माइनिंग शुरू हुआ था, इधर महुआ के पेड़ थे वे कट गए”। बुनियादी सुविधाओं को लेकर वे कहते हैं, “अधिकारी आते हैं तो कहते हैं एनटीपीसी यहां रोड बनाएगा, लेकिन अबतक बना नहीं”। इसी गांव के दामोदर राणा ने कहा, “एनटीपीसी के लिए त्रिवेणी सैनिक कोल माइन प्राइवेट लिमिटेड खनन का काम करती है और यहां से लेकर टंडवा तक कोयला खदानें हैं”।

जुगरा के निकट ग्रामीण आपस में बात करते हुए।

 

बगल के जुगरा गांव के एक बुजुर्ग ग्रामीण जानकी साव ने कहा वे तीन भाई हैं और उनकी जमीन भी कोयला परियोजना में गयी है। गांव में विकास के सवाल पर दशरथ साव नाम के ग्रामीण ने ओबी के पहाड़ को दिखाते हुए व्यांगात्मक लहजे में कहा, “यहां बहुत विकास हुआ है, देखिए सोना का पहाड़ लगा है”। राकेश नाम के एक युवक ने कहा कि दुर्गा पूजा के बाद आराहरा में माइंस खुलने वाला है और जुबरा भी उसके जद में आएगा।

अमित कुमार सिंह नामक एक ग्रामीण ने कहा, “पढा-लिखा होने पर भी कोयला खनन परियोजनाओं में कुर्सी वाला काम स्थानीय लोगों को नहीं मिलता है, उन्हें मजदूरों वाला काम मिलता है”। 36 वर्षीय भुवनेश्वर साव और 32 वर्षीय सिकंदर साव की भी रोजगार से जुड़ी शिकायतें हैं।

अमित कुमार सिंह।

 

ग्रामीण व स्कूल संचालक अनुज कुमार सिंह कहते हैं, “17 मई 2016 तक जिसकी उम्र 18 साल हुई है, उसे ही विस्थापित माना जाएगा और विस्थापितयों के लिए तैयार योजना से लाभान्वित होगा, बाकी वंचित रह जाएंगे”।

चेपकला पंचायत के मुखिया अनिकेत कुमार नायक कहते हैं, “हमारी पंचायत में चार राजस्व गांव हैं, जिसमें सिर्फ हुदवा गांव में कोयला नहीं है, बाकी तीन गांव जुगरा, चेपकला और आराहरा में कोयला है”। वे कहते हैं, “कोयला खनन परियोजनाओं के चलते हमलोग विस्थापित हो रहे हैं, हम जाएं तो जाएं कहां, इस प्रक्रिया में हमें पूछ ये पूछ नहीं रहे हैं”।

मुखिया अनिकेत कहते हैं, “एनटीपीसी की माइनिंग का सकेंड फेज आराहरा-जुगरा में शुरू होगा। हमलोगों ने डीसी से मुलाकात के बाद ग्रामसभा की और हमारी 11-12 मांगें है, जिन्हें पूरा किया जाना चाहिए”। वे कहते हैं कि ठीक है आप बाहर वालों को कोयला परियोजना में नौकरी दीजिए, लेकिन 75 प्रतिशत स्थानीय लोगों को भी रोजगार दें।

मुखिया अनिकेत नायक।

 

कुछ लोगों ने स्थानीयता की परिभाषा पर सवाल उठाया कि इनके लिए पूरा प्रदेश ही स्थानीय है, जबकि ऐसी परियोजनाओं से यहां के ग्रामीण प्रभावित हो रहे हैं। मालूम हो कि झारखंड सरकार ने इस संबंध में एक कानून बनाया है जिसके तहत कम तनख्वाह वाली नौकरियों में 75 प्रतिशत स्थानीय लोगों को निजी कंपनियां को रखने का निर्देश है। यहां स्थानीय से तात्पर्य प्रदेश के लोगों से है।

कोयला परियोजनाओं से प्रभावित व गुथी जिंदगी

इस इलाके के लोग कोयला खनन परियोजनाओं की वजह से प्रभावित हैं और इस पर ही उनकी जिंदगी आश्रित भी है। यह स्थिति उनकी जिंदगी, अभिव्यक्ति और व्यवहार में एक विरोधाभाष पैदा करती है। वे बोलना चाहते हैं, लेकिन खुल कर बोलते नहीं। वे विरोध जताना चाहते, पर जता नहीं पाते, क्योंकि नौकरी जाने का डर रहता है। जिन किसानों के खेत अलग-अलग कोयला खदानों के लिए गए, वे उन्हीं खदानों में नौकरी कर रहे हैं। यानी वे पहले भूमिस्वामी और किसान थे और अब स्थिति बदल गयी है और कांट्रेक्ट की इस नौकरी में कभी भी किसी किसी आधार पर बैठाया जा सकता है। ऐसे में लोग मुखर होकर बोलना नहीं चाहते।

जुगरा गांव के आखिरी छोर पर सड़क पर बहता पानी।

 

इस संवाददाता से खनन परियोजनाओं में काम करने वाले कई ग्रामीणों ने बात की, लेकिन ज्यादातर ने नाम नहीं छापने का आग्रह किया। अलग-अलग गांवों में करीब दो दर्जन लोगों से इस संवाददाता के संवाद के दौरान, हर दूसरा व्यक्ति किसी न किसी तरह कोयला खनन परियोजनाओं पर रोजगार के लिए आश्रित दिखा। यह उन्हें विवश करता है।

मुंशी रविदास।

 

एक बुजुर्ग मुंशी रविदास ने कहा कि इससे हमें सड़क पर चलने में दिक्कत होती है। अगर बारिश हो जाती है तो परेशानी और बढ जाती है। कई लोग जो कोयला परियोजनाओं में रोजगार पा रहे हैं, उन्होंने अपने नाम का उल्लेख करने से इनकार कर दिया। ग्रामीणों ने कहा कि हालांकि इस जगह के उस ओर नजर आ रहे हरे-भरे खेत कुछ समय बाद शायद कोयला खनन की जद में आ जाएगा।

(फोटो : राहुल सिंह।)

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