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एनर्जी ट्रांजिशन प्रक्रिया में कोल इंडिया कैसे दे सकता है अपना योगदान?

रजरप्पा कोयला खदान का दृश्य। फोटो - राहुल सिंह।

भारत में जारी एनर्जी ट्रांजिशन प्रक्रिया में उन कंपनियों की अहम भूमिका है जो जीवाष्म ऊर्जा आधारित कारोबार में प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से संलग्न है। यह उन कंपनियों के अस्तित्व व स्वयं की प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए भी आवश्यक है।

भारत में 83 प्रतिशत कोयला उत्पादित करने वाली कंपनी कोल इंडिया लिमिटेड (CIL) की भी इस प्रक्रिया में अहम भूमिका होगी। भारत में यह कंपनी जीवाष्म ऊर्जा के लिए कच्चे माल की सबसे बड़ी उत्पादक कंपनी है। स्वच्छ ऊर्जा की मांग बढने के साथ इसका यह परंपरागत कारोबार प्रभावित होगा। इंटरनेशन इंस्टीट्यूट ऑफ सस्टेनेबल डेवलपमेंट की इस महीने आयी एक स्टडी रिपोर्ट में कोल इंडिया लिमिटेड सहित भारत की सार्वजनिक क्षेत्र की तीन कंपनियों की एनर्जी ट्रांजिशन प्रक्रिया में भूमिका और संभावित रणनीति का विश्लेषण किया गया है। दो अन्य सरकारी कंपनियां हैं – एनटीपीसी और भारतीय रेलवे।

इस रिपोर्ट के अनुसार, वित्त वर्ष 2020 के दौरान कोल इंडिया का कुल उत्पादन 602 मिट्रिक टन था, जिसे कंपनी ने 2024 तक एक एक बिलियन टन करने का लक्ष्य रखा है।

इस रिपोर्ट में कहा गया है कि स्वच्छ ऊर्जा लक्ष्यों के मद्देनजर सीआइएल ने विविधीकरण योजनाएं भी तैयार की है। इस रणनीति के तहत सीआइएल ने सौर फोटोवोल्टिक एसपीवी बिजली उत्पादन और एकीकृत फोटोवोल्टिक विनिर्माण के लिए दो सहायक कंपनियों सीआइएल सोलर पीवी और सीआइएल नवीकरणीय ऊर्जा लिमिटेड की स्थापना की है।

इस रणनीति के तहत एनटीपीसी के साथ साझेदारी में 50 मेगावाट की सौर ऊर्जा परियोजना पर काम किया जाना है और 2024 तक तीन गीगावाट सौर ऊर्जा स्थापित करना है। यह परामर्श दिया गया है कि कंपनी को उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन बोलियों में हिस्सा लेना जारी रखना चाहिए। शोध के आधार पर यह भी कहा गया है कि बड़े पीएसयू आरंभिक मैन्युफैक्चरिंग स्थापित करने के लिए अच्छी जगह हैं, जिसमें छोटे उपक्रमों की तुलना में उच्च निवेश की जरूरत होती है और पीएसयू के पास पूंजी जुटाने की क्षमता होती है।

कर्मचारियों व कोयला आधारित समुदाय की चिंता

इस रिपोर्ट में कहा गया है कि सीआइएल भारत में सबसे अधिक रोजगार प्रदाता कंपनियों में एक है, जिसके 2.72 लाख स्थायी कर्मचारी हैं और हजारों की संख्या में कांट्रेक्ट पर लोग इस कंपनी के लिए काम करते हैं।

इस रिपोर्ट में 2020 से 2050 तक कोयला उत्पादन का विश्लेषण किया गया है और कोल फेज आउट की स्थिति में उत्पन्न चुनौतियों से जूझने पर अध्ययन प्रस्तुत किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, मध्यावधि में कोयले की मांग कम होने के कारण सीआइएल सक्रिय रूप से कोयले की खदानों को बंद करने की योजना बना सकती है, संचालन-लागत को कम कर सकती है या निजी ठेकेदारों को खदानें पट्टे पर दे सकती है। ऐसे उपाय प्रति टन कोयला उत्पादन का राजस्व बढा सकता है और खतरे को कम कर सकता है। यह सलाह दी गयी है कि ऐसे उपायों को केवल जस्ट ट्रांजिशन सिद्धांतों के अनुरूप लागू किया जाना चाहिए। यहां यह गौरतलब है कि झारखंड जैसे राज्य में बहुतायत में कोल इंडिया की सहायक कंपनी सीसीएल ठेका कंपनियों के माध्यम से काम करवा रही हैं।

इस रिपोर्ट में कहा गया है कि जोखिम का आकलन कर, विविधिकरण के लिए एक दृष्टिकोण तय किया जाना चाहिए। सीआइएल के अंदर एक आंतरिक मूल्यांकन व उसके निष्कर्षाें पर सार्वजनिक रूप से रिपोर्टिंग किए जाने से इसके स्वच्छ ऊर्जा कंपनी बनने के इरादे के बाजार के संकेतों को मजबूती मिलेगी।

इस रिपोर्ट में कहा गया है कि व्यावसायिक जोखिमों के अनुरूप स्वच्छ ऊर्जा की महत्वाकांक्षा बढायी जानी चाहिए। वर्तमान में एनटीपीसी जैसे कुछ सार्वजनिक उपक्रमों की तुलना में सीआइएल की महत्वाकांक्षाएं कम हैं और इन महत्वाकांक्षाओें को जोखिमों से जोड़ने का कोई स्पष्ट तर्क नहीं है।

मौजूदा मजबूत राजस्व के दौर में स्वच्छ ऊर्जा में निवेश जरूरी

इसमें कहा गया है कि एसपीवी लक्ष्यों को 4.4 गुणा बढाने से वर्तमान में राष्ट्रीय आकांक्षाओं के आधार पर कोयले से संबंधित सभी जोखिमों को पूरी तरह समाप्त किया जा सकता है। इसमें यह सुझाव दिया गया है कि सीआइएल अपनी नवगठित एसपीवी सहायक कंपनियों सीआइएल सोलर पीवी और सीआइएल नवीकरणीय ऊर्जा लिमिटेड के लिए एक रोडमैप तैयार करे।

यह भी सुझाव दिया गया है कि कोल इंडिया लिमिटेड विविधीकरण में जल्दी निवेश करे, क्योंकि अभी उसका जीवाष्म राजस्व मजबूत है। सीआइएल के लिए कैश फ्लो एट रिस्क का सबसे बड़ा संकट 2030 से 2040 के बीच होगा, लेकिन निकट भविष्य में स्वच्छ ऊर्जा निवेश की आवश्यकता होगी ताकि उसकी परिसंपत्तियां समय पर वित्तीय रूप से आत्मनिर्भर हों।

एक सरकारी महारत्न कंपनी के रूप में सीआइएल का महत्व पूरे देश में कोयला आधारित समुदायों में इसके महत्व पर आधारित है। सीआइएल अपनी सामाजिक और पर्यावरणीय जिम्मेवारी के साथ कैसे तालमेल बैठाता है, इसके आधार पर विविधीकरण की किसी भी रणनीतिक सोच पर विचार की सिफारिश की गयी है।

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